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Saturday, August 3, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: आवाज़ थर्राने लगी,कंठ भर्राने लगे

"निरंतर" की कलम से.....: आवाज़ थर्राने लगी,कंठ भर्राने लगे: आवाज़ थर्राने लगी कंठ भर्राने लगे इंसानियत को झुलसते देख इंसानों के ह्रदय रोने लगे लाचार हो कर शर्म से मुंह छिपाने लगे यही ह...

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