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Wednesday, September 11, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: गले मिलो ना मिलो देख कर मुस्काराया तो करो

"निरंतर" की कलम से.....: गले मिलो ना मिलो देख कर मुस्काराया तो करो: गले मिलो ना मिलो देख कर  मुस्काराया तो करो हर छोटी बड़ी बात का फसाना मत बनाया करो नौक झोंक तो ज़िन्दगी में होती ही रहती है ...

"निरंतर" की कलम से.....: दुखों का घडा विचित्र बहुत है

"निरंतर" की कलम से.....: दुखों का घडा विचित्र बहुत है: दुखों का घडा विचित्र बहुत है  बड़ा इतना कभी भरता नहीं है जिद्दी इतना कभी गिरता नहीं है मज़बूत इतना कभी टूटता नहीं आशा को...

"निरंतर" की कलम से.....: धूप बोली चांदनी से

"निरंतर" की कलम से.....: धूप बोली चांदनी से: धूप बोली चांदनी से सदियों पुराने रिवाज़ से अब मुक्त हो जाओ तुम समझाओ चाँद को मैं समझाऊंगी सूरज को कभी मैं रात को छाऊँ कभी तु...

"निरंतर" की कलम से.....: अहम् के उन्माद में

"निरंतर" की कलम से.....: अहम् के उन्माद में: देवताओं ने भी नहीं सोचा होगा अहम् के उन्माद में मनुष्य धरती पर तांडव मचाएगा प्रक्रति के हर रंग को बदरंग कर देगा इर्ष्या द्वेष में...

"निरंतर" की कलम से.....: म्रत्यु भय

"निरंतर" की कलम से.....: म्रत्यु भय: अंतिम  समय निकट था पलंग पर  लाचार   पड़ा था  इतना सह चुका था इतना थक चुका था ना भावनाएं मचल  रही थीं ना जीने की इच्छा  बची थी...

"निरंतर" की कलम से.....: दुखों को चौराहे पर मत टांगो

"निरंतर" की कलम से.....: दुखों को चौराहे पर मत टांगो: दुखों को चौराहे पर मत टांगो स्वयं को निर्बल मत दर्शाओ हर आता जाता व्यक्ति अपने सोच से गुण दोष निकालेगा कारण पूछेगा कोई सहानूभूत...

"निरंतर" की कलम से.....: समझना-समझाना

"निरंतर" की कलम से.....: समझना-समझाना: समझने समझाने पर चर्चा मैं गुरु शिष्य को समझाने लगे जो इशारों में नहीं समझे उसे कम से कम शब्दों में समझाना चाहिए जो इससे भी नहीं सम...

Saturday, September 7, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: कथनी करनी में दिन रात का अंतर होता है

"निरंतर" की कलम से.....: कथनी करनी में दिन रात का अंतर होता है: सुन्दर सौम्य चेहरा बातें भी बहुत सुन्दर प्रेम व्यवहार संस्कारों की निश्छल मन सरल ह्रदय संबंधों को बनाये रखने की सहनशीलता धैर्य धीरज...

"निरंतर" की कलम से.....: सपनों को पकड़ने की चाह में

"निरंतर" की कलम से.....: सपनों को पकड़ने की चाह में: आकाश की हर दिशा में उड़ते हुए छितराए हुए सपनों को पकड़ने की चाह में निरंतर दिशा बदल बदल कर जीवन भर उछलता रहा कभी ऊँगलिया  सपनों...

"निरंतर" की कलम से.....: मेरी बात से चौंकना भी मत

"निरंतर" की कलम से.....: मेरी बात से चौंकना भी मत: मेरी बात से चौंकना भी मत मुझ पर अविश्वास भी मत करना मैं तुमसे प्रेम तो करता हूँ पर केवल तुमसे ही नहीं आधा तुम से आधा स्वयं से प्र...

"निरंतर" की कलम से.....: केवल आप कहने से कोई बड़ा नहीं हो जाता

"निरंतर" की कलम से.....: केवल आप कहने से कोई बड़ा नहीं हो जाता: उम्र में छोटे  एक मित्र को जब आप कह कर  संबोधित किया मित्र कहने लगा कृपया आप मुझे  आप कह कर संबोधित ना करें मैं आपसे उम्...

"निरंतर" की कलम से.....: शिक्षक दिवस पर कविता-केवल शिक्षक ही नहीं देता शिक्...

"निरंतर" की कलम से.....: शिक्षक दिवस पर कविता-केवल शिक्षक ही नहीं देता शिक्...: (शिक्षक दिवस पर कविता) केवल शिक्षक ही नहीं देता शिक्षा स्कूल कॉलेज की चारदीवारियों में ही नहीं मिलती शिक्षा केवल शिक्षक ही नही...

"निरंतर" की कलम से.....: प्रशंसा करनी है तो मेरे मुंह पर नहीं

"निरंतर" की कलम से.....: प्रशंसा करनी है तो मेरे मुंह पर नहीं: प्रशंसा करनी है तो मेरे मुंह पर नहीं पीठ पीछे करो जितना लायक  हूँ बस उतनी ही करो मुंह पर प्रशंसा से मुझे भ्रम रहता है प्रश...

Wednesday, September 4, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: हार जीत अंतिम पड़ाव नहीं जीवन का

"निरंतर" की कलम से.....: हार जीत अंतिम पड़ाव नहीं जीवन का: कोई जीत स्थायी नहीं होती कोई हार सदा हार नहीं रहती हार जीत अंतिम पड़ाव नहीं जीवन का जीवन कर्म प्रधान होता है विवेक पथ ...

"निरंतर" की कलम से.....: कभी कभी मेरा चेतन मन भी अचेतन हो जाता है

"निरंतर" की कलम से.....: कभी कभी मेरा चेतन मन भी अचेतन हो जाता है: कभी कभी मेरा चेतन मन भी अचेतन हो जाता है व्यक्तित्व के विपरीत अनिच्छा से  इर्ष्या द्वेष काम क्रोध लालच के संसार में भ्रमण कराता ...

"निरंतर" की कलम से.....: शब्द मात्र शब्द ही नहीं

"निरंतर" की कलम से.....: शब्द मात्र शब्द ही नहीं: शब्द मात्र शब्द ही नहीं लेखकीय मन का आइना होते हैं पढने मात्र से ही मन के भाव उजागर कर देते हैं पढने वाले के मन में अनुभ...

Tuesday, September 3, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: मुझे कोई दुःख नहीं

"निरंतर" की कलम से.....: मुझे कोई दुःख नहीं:  कितना दुर्भाग्य है मुझे कोई दुःख नहीं दूसरों का दुःख समझने का अनुभव नहीं खुशी का महत्व जानने का कोई साधन नहीं किस बात...

"निरंतर" की कलम से.....: वेदना का ना स्वर होता ना चेहरा

"निरंतर" की कलम से.....: वेदना का ना स्वर होता ना चेहरा: वेदना का ना स्वर होता ना चेहरा ना ही देह होती ह्रदय में तीव्र रक्त संचार व्याकुल मन  शुष्क कंठ आँखों में नमी विचार न...

Sunday, September 1, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: शब्दों का खेल

"निरंतर" की कलम से.....: शब्दों का खेल: ना कविता में दर्द होता है ना कोई गीत दुःख से भरा होता है ना प्यार मोहब्बत किसी ग़ज़ल में होता ना किसी नज़्म में जुदाई बेवफ...

"निरंतर" की कलम से.....: हरा हो कर पीला हो जाना जीवन की नियति है

"निरंतर" की कलम से.....: हरा हो कर पीला हो जाना जीवन की नियति है: वृक्ष पर लगे पीले पत्ते से एक बूढ़े ने पूछ लिया बरसों हरा रहने के बाद वृक्ष पर झूमने के बाद पीलापन कैसा लगता है वृक्ष से टूट...

"निरंतर" की कलम से.....: ना पंडित ना पादरी हूँ

"निरंतर" की कलम से.....: ना पंडित ना पादरी हूँ: ना पंडित ना पादरी हूँ ना मुल्ला ना ग्रंथि हूँ मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे चर्च में माथा टेकता हूँ प्रेम का अमृत चखता हूँ सब की इज्ज़...

"निरंतर" की कलम से.....: छोटा सा कटाक्ष

"निरंतर" की कलम से.....: छोटा सा कटाक्ष: जुबान का फिसलना क़यामत ढाह गया छोटा सा कटाक्ष ह्रदय में शूल बन कर चुभ गया संवाद के अभाव में ज़ख्म बन गया मन पर अहम् का भ...

"निरंतर" की कलम से.....: करना भी होता है

"निरंतर" की कलम से.....: करना भी होता है: रात भर सोचता रहा अनभूतियों से भरी यादगार रचना लिखूं पाठकों के मन को झंझोड़ कर रख दूं सोचने पर मजबूर कर दूं रात गुजर गयी कलम हाथ म...

Friday, August 30, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: कितना कुछ कह जाते हैं पत्ते

"निरंतर" की कलम से.....: कितना कुछ कह जाते हैं पत्ते: कोंपल से पत्ता बनने तक पत्ता बनने से झड़ने तक मूक रहते हैं सहते हैं, आंधी तूफ़ान गर्मी सर्दी से लड़ते हैं बसंत में झूम...

"निरंतर" की कलम से.....: अब तक तो

"निरंतर" की कलम से.....: अब तक तो: अब तक तो इर्ष्या द्वेष के गाँव में जात पांत के कसबे धर्म के नगर में मन के राक्षसी राष्ट्र में जी लिए अब मन की खिड़की ह्रदय...

"निरंतर" की कलम से.....: बहुत अच्छा लगता है दूसरों की बात करना

"निरंतर" की कलम से.....: बहुत अच्छा लगता है दूसरों की बात करना: बहुत अच्छा लगता है   दूसरों की बात करना लोगों का मज़ाक उड़ाना   उन पर ऊंगली उठाना   लोगों की जुबां से खुद   ज़ख्म खाओगे जिस दिन   ...

"निरंतर" की कलम से.....: जब अपना ही बन कर नहीं रह सका

"निरंतर" की कलम से.....: जब अपना ही बन कर नहीं रह सका: जब अपना ही बन कर नहीं रह सका किसी और का बन कर कैसे रहूँ पथ से भटक गया हूँ भ्रम जाल में फंस चुका हूँ मरीचिका के पीछे दौड़ रहा हूँ...

"निरंतर" की कलम से.....: बुद्धि के विकास ने

"निरंतर" की कलम से.....: बुद्धि के विकास ने: गेंदे का फूल गुलाब के फूल से इर्ष्या नहीं करता कोयल की कूंक से गोरिय्या द्वेष नहीं रखती कुए का पानी तालाब के पानी में मिला...

"निरंतर" की कलम से.....: भ्रम जाल में फंसा दानव बन रहा इंसान

"निरंतर" की कलम से.....: भ्रम जाल में फंसा दानव बन रहा इंसान: रोता है मन तड़पता है मन जब देखता है रोता हुआ बचपन घबराई हुई जवानी सहमा हुआ बुढापा दरकती निष्ठाएं खोखले रिश्ते स्वार्थ का व...

"निरंतर" की कलम से.....: हार कर भी जीतना चाहता हूँ

"निरंतर" की कलम से.....: हार कर भी जीतना चाहता हूँ: येन केन प्रकारेण जीतना नहीं चाहता हूँ होड़ के चक्रव्यूह में फंसना नहीं चाहता हूँ कर्म पथ पर नदी सा अविरल  बहना चाहता हूँ स...

"निरंतर" की कलम से.....: कलम हाथ में लेते ही

"निरंतर" की कलम से.....: कलम हाथ में लेते ही: कलम हाथ में लेते ही मेरा चंचल मन ना जाने कहाँ से आश्वासन पाता है शरीर की सारी थकान मिट जाती है, ऊंगलियों में ऊर्जा का संचा...

"निरंतर" की कलम से.....: तटस्थ

"निरंतर" की कलम से.....: तटस्थ: बड़ी आसानी से तुमने कह दिया तुम किसी के झगडे में नहीं पड़ते हो सदा तटस्थ रहते हो हर झगडे में एक सही दूसरा गलत होता है जानते हुए ...

Sunday, August 25, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: अगर सोच सार्थक हो

"निरंतर" की कलम से.....: अगर सोच सार्थक हो: बचपन से सुनता रहा हूँ अब भी निरंतर सुनता हूँ आगे भी सुनता रहूँगा जीवन रोने के लिए नहीं हँसने के लिए होता है बात असत्य नहीं है पर य...

"निरंतर" की कलम से.....: लोग हद पार करने की बात तो करते हैं

"निरंतर" की कलम से.....: लोग हद पार करने की बात तो करते हैं: लोग हद पार करने की बात तो करते हैं मगर हद तो जब पार होती है जब खुद के स्वार्थ के लिए लोग  हद पार करते हैं पर जब बात दूसरों की...

"निरंतर" की कलम से.....: हर ओर मेला ही मेला

"निरंतर" की कलम से.....: हर ओर मेला ही मेला: हर ओर मेला ही मेला ह्रदय में,मन में, मस्तिष्क में रंग बिरंगा मदमाता लुभाता मेला इच्छाओं के नित नए सपने दिखाता मेला सागर ...

"निरंतर" की कलम से.....: केवल समय को पता है

"निरंतर" की कलम से.....: केवल समय को पता है: केवल  समय को पता है कब तक ? सम्बन्ध निभेगा कब अविश्वास की बलि चढ़ेगा कब समापन होगा ? कौन पहल करेगा ? किसका  सब्र ख़त्म...

Tuesday, August 20, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: शब्द भी वही वाक्य भी वही

"निरंतर" की कलम से.....: शब्द भी वही वाक्य भी वही: तुमने कहा गुलाब के  फूल ने  मुझे  लुभाया मैंने भी यही कहा गुलाब के  फूल ने  मुझे  लुभाया तुम्हें उसकी सुन्दरता ने  मुझे सुगं...

"निरंतर" की कलम से.....: महकते फूल

"निरंतर" की कलम से.....: महकते फूल: चांदी सा चमकते चमेली के फूल को देखा काँटों की बीच सुर्ख लाल गुलाब को झांकते देखा हर सिंगार के नन्हे फूल को सुगंध फैलाते देखा...

"निरंतर" की कलम से.....: आशाएं कहने लगी एक दिन मुझसे

"निरंतर" की कलम से.....: आशाएं कहने लगी एक दिन मुझसे: आशाएं कहने लगी  एक दिन मुझसे निरंतर बहुत थक गयी हैं हर दिन नयी आशाएं संजोते हो एक पूरी नहीं होती दूसरी मन में लाते हो कु...

"निरंतर" की कलम से.....: माँ आज मुझे अपने सीने से लगा लो

"निरंतर" की कलम से.....: माँ आज मुझे अपने सीने से लगा लो: माँ आज मुझे  अपने सीने से लगा  लो  मेरा बचपन मुझे वापस लौटा दो मैंने समझा था बहुत बड़ा हो गया हूँ पढ़ लिख कर बड़ा इंसान बन गया हू...

"निरंतर" की कलम से.....: उपलब्धि

"निरंतर" की कलम से.....: उपलब्धि: मित्र ने  रत्न जडित कीमती घड़ी  क्या खरीद ली सुबह से शाम तक घड़ी  का गुणगान उसकी  दिनचर्या  बन गयी जीवन की बड़ी उपलब्धि हो गयी ...

Friday, August 16, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: ईमान का कटघरा

"निरंतर" की कलम से.....: ईमान का कटघरा: (जीवन दर्शन) ) पडोसी के घर पर लगे अमरुद के पेड़ से सड़क की ओर लटकते अमरुद को देखा तो मन लालच से भर गया स्वयं पर काबू ना रख पाया इ...

"निरंतर" की कलम से.....: स्थिति परिस्थिति कैसी भी हो

"निरंतर" की कलम से.....: स्थिति परिस्थिति कैसी भी हो: ( जीवन अमृत ) असफलताओं से घबराकर डरने लगा कर्म से जी चुराने लगा आत्मविश्वास खो बैठा अपने आप में सिमट कर रह गया न...

"निरंतर" की कलम से.....: समझदारी

"निरंतर" की कलम से.....: समझदारी: (जीवन अमृत) तुम्हारी बात समझ नहीं पाया तो कोई अपराध नहीं किया मेरी समझदारी पर प्रश्न मत खडा करो मेरी हँसी मत उडाओ अपने संकुचित सोच ...

Thursday, August 15, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: सम्मान की दृष्टि

"निरंतर" की कलम से.....: सम्मान की दृष्टि: साधारण कुडता पयजामा पहन कर समारोह में चला गया देखते ही मित्र ने टोक दिया निरंतर कुछ तो अपनी प्रतिष्ठा का ख्याल करो इतनी साधारण व...

Wednesday, August 14, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: मन मस्तिष्क में सामंजस्य नहीं हो तो

"निरंतर" की कलम से.....: मन मस्तिष्क में सामंजस्य नहीं हो तो: कल रात आँखें भारी होने लगी नींद बुलाने लगी बिस्तर पर लेट कर नींद की प्रतीक्षा करने लगा अचानक मन कहने लगा नींद बहुत सताती ह...

Tuesday, August 13, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: मैं नहीं चाहता

"निरंतर" की कलम से.....: मैं नहीं चाहता: मैं नहीं चाहता  बिमारी में व्यथा में व्याकुलता में निराशा में कोई मेरा हाल पूछे मेरी परेशानियों का कारण पूछे मैं जानता ह...

"निरंतर" की कलम से.....: ज़िन्दगी अब तक तुम प्रश्न करती रही

"निरंतर" की कलम से.....: ज़िन्दगी अब तक तुम प्रश्न करती रही: ज़िन्दगी अब तक तुम प्रश्न करती रही मुझसे अब कुछ प्रश्न मैं भी कर लूं तुमसे जब जिंदगी भर चैन नहीं मिलता फिर चैन का भ्रम क्यों द...

"निरंतर" की कलम से.....: दुखी मन बोला सुखी मन से

"निरंतर" की कलम से.....: दुखी मन बोला सुखी मन से: दुखी मन बोला सुखी मन से जब तुम भी मन मैं भी मन फिर मैं दुखी तुम खुश कैसे सुखी मन से अधिक पाने की इच्छा में तुम होड़ में जीते ह...

"निरंतर" की कलम से.....: किस,किस को किस,किस बात का दोष दूं

"निरंतर" की कलम से.....: किस,किस को किस,किस बात का दोष दूं: किस,किस को किस,किस बात का दोष दूं सपने तो मैंने देखे थे अपेक्षाएं भी मैंने रखी थीं आशाएं भी मेरी थी इच्छाएं मैंने संजोई थी करने वा...

"निरंतर" की कलम से.....: क्या वही करता रहूँ?

"निरंतर" की कलम से.....: क्या वही करता रहूँ?: क्या वही करता रहूँ जो करता रहा हूँ क्या वैसे ही सोचता रहूँ जैसे सोचता रहा हूँ क्या वैसे ही जीता रहूँ जैसे जीता रहा हूँ प्रश्...

"निरंतर" की कलम से.....: मन कहाँ मानता है

"निरंतर" की कलम से.....: मन कहाँ मानता है: मन कहाँ मानता है कहना किसी का जो मेरी मानेगा कितना भी समझाओ समझता नहीं है लाख सर फुटव्वल करो मान मनुहार करो जिद पर अड़ जाए त...

"निरंतर" की कलम से.....: दूसरा श्रेष्ठ कैसे मुझसे

"निरंतर" की कलम से.....: दूसरा श्रेष्ठ कैसे मुझसे: दूसरा श्रेष्ठ कैसे मुझसे सोच सोच कर दुखी होता रहा कैसे श्रेष्ठता जताऊँ उससे उधेड़बुन में लगा रहा कर्म पथ से भटक  कर इर्ष्या के आँग...

Sunday, August 11, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: कभी सोचा है ?

"निरंतर" की कलम से.....: कभी सोचा है ?: कभी सोचा है कैसे बचाती है जान नन्ही सी चिड़िया आंधी तूफ़ान से कभी ख्याल आया कहाँ सोता है गली का कुत्ता सर्दी की रात में ...

Saturday, August 10, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: चाहो खुद को उत्तम मानो चाहो तो अति उत्तम मानो

"निरंतर" की कलम से.....: चाहो खुद को उत्तम मानो चाहो तो अति उत्तम मानो: चाहो खुद को  उत्तम मानो  चाहो तो  अति उत्तम मानो  कोई रोक नहीं है कोई टोक नहीं चाहो तो खुद को  सर्वोत्तम मानो अहम् से इतना...

"निरंतर" की कलम से.....: क्या खोया क्या पाया

"निरंतर" की कलम से.....: क्या खोया क्या पाया: क्या खोया क्या पाया जिंदगी में अब तो जान लो नहीं लगाया हो हिसाब तो अब लगा लो कितनो का दिल दुखाया कितनों को दुश्मन बनाया अब तो दिल...

"निरंतर" की कलम से.....: चाँद अब परेशान होने लगा है

"निरंतर" की कलम से.....: चाँद अब परेशान होने लगा है: कभी तीज कभी ईद कभी पूर्णिमा कभी करवा चौथ पर पूजे जाने से चाँद अब परेशान होने लगा है मैंने कारण पूछा तो मुंह बिचका कर कहन...

"निरंतर" की कलम से.....: उन पर कोई रोक नहीं

"निरंतर" की कलम से.....: उन पर कोई रोक नहीं: वो मुझे चाहे ना चाहे उन पर कोई रोक नहीं मैं उनको चाहता रहूँगा वो ह्रदय को काबू  में कर सकते हैं खुद की भावनाओं से खुद ही खेल...

Thursday, August 8, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: किसका मन रखूँ

"निरंतर" की कलम से.....: किसका मन रखूँ: किसका मन रखूँ किसका ना रखूँ किसे  खुश करूँ किसे नाराज़ करूँ मन में दुविधा को जन्म  देता  प्रश्न निरंतर मुंह खोले सामने ख...

"निरंतर" की कलम से.....: अर्थ का अनर्थ

"निरंतर" की कलम से.....: अर्थ का अनर्थ: आज अर्थ का अनर्थ हो गया मित्र से वार्तालाप वाकयुद्ध में बदल गया असहनशीलता   ने जिव्ह्वा से नियंत्रण समाप्त कर दिया मुंह से...

Wednesday, August 7, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: सोच में एकरूपता चाहता

"निरंतर" की कलम से.....: सोच में एकरूपता चाहता: ना पर्वत श्रंखलाएं एक ऊंचाई की होती ना सारी नदियाँ एक गति से बहती ना पक्षी इकसार होते ना पेड़ पौधे एक आकार के होते फिर क्यों मनुष्...

"निरंतर" की कलम से.....: सोच में एकरूपता चाहता

"निरंतर" की कलम से.....: सोच में एकरूपता चाहता: ना पर्वत श्रंखलाएं एक ऊंचाई की होती ना सारी नदियाँ एक गति से बहती ना पक्षी इकसार होते ना पेड़ पौधे एक आकार के होते फिर क्यों मनुष्...

Monday, August 5, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: अब कातिल ही मुंसिफ हो गया है

"निरंतर" की कलम से.....: अब कातिल ही मुंसिफ हो गया है: मुल्क का हाल इतना बेहाल हो गया है अब कातिल ही मुंसिफ हो गया है इन्साफ क्या ख़ाक मिलेगा हर लम्हा डर कर जीना पडेगा खून का...

"निरंतर" की कलम से.....: अगर छोटी छोटी बात में रूठना हो तो

"निरंतर" की कलम से.....: अगर छोटी छोटी बात में रूठना हो तो: अगर छोटी छोटी बात में रूठना हो तो मुझसे मित्रता मत करना एक क्षण के लिए भी दुःख का कारण मत बनना कहीं ऐसा ना हो मित्रता के नाम से ह...

"निरंतर" की कलम से.....: अब कातिल ही मुंसिफ हो गया है

"निरंतर" की कलम से.....: अब कातिल ही मुंसिफ हो गया है: मुल्क का हाल इतना बेहाल हो गया है अब कातिल ही मुंसिफ हो गया है इन्साफ क्या ख़ाक मिलेगा हर लम्हा डर कर जीना पडेगा खून का...

"निरंतर" की कलम से.....: कहने की ललक में

"निरंतर" की कलम से.....: कहने की ललक में: तुमने जिव्हा पर नियंत्रण खो दिया केवल कहने की ललक में किसी व्यक्ति विशेष पर स्थिति परिस्थिति पर बिना सोचे समझे कुछ कह दिया यह तुम...

Saturday, August 3, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: आवाज़ थर्राने लगी,कंठ भर्राने लगे

"निरंतर" की कलम से.....: आवाज़ थर्राने लगी,कंठ भर्राने लगे: आवाज़ थर्राने लगी कंठ भर्राने लगे इंसानियत को झुलसते देख इंसानों के ह्रदय रोने लगे लाचार हो कर शर्म से मुंह छिपाने लगे यही ह...

"निरंतर" की कलम से.....: व्यथित क्यों होते हो

"निरंतर" की कलम से.....: व्यथित क्यों होते हो: इच्छाएं पूरी नहीं हुई  तो  व्यथित क्यों होते हो क्यों निराशा के भंवर में फंसते हो इच्छाएं तो राम कृष्ण की भी पूरी नहीं हुई ...

Thursday, August 1, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: पलाश का पेड़

"निरंतर" की कलम से.....: पलाश का पेड़: केसरिया रंग के फूलों से लदा पलाश का पेड़ जंगल में आग का आभास  देता हरे पेड़ों के बीच जंगल का राजा नज़र आता  ना उसके फूलों को मा...

"निरंतर" की कलम से.....: आईने कितने भी बदलूँ

"निरंतर" की कलम से.....: आईने कितने भी बदलूँ: आईने कितने भी बदलूँ अक्स उसका ही दिखता चहरे कितने भी देखूं हर चेहरे में अक्स उसका ही दिखता ख्व्वाब भी देखूं तो अक्स उसका ही ...

"निरंतर" की कलम से.....: परेशां नहीं हूँ लोगों से

"निरंतर" की कलम से.....: परेशां नहीं हूँ लोगों से: परेशां नहीं हूँ लोगों से परेशां हूँ लोगों के हाल से परेशानी नहीं हूँ बीमार को देख कर परेशां हूँ बीमारी से कौन करेगा इलाज़ नफरत की ...

"निरंतर" की कलम से.....: उनके दिल जलते रहे

"निरंतर" की कलम से.....: उनके दिल जलते रहे: हम अकेले थे वो बहुत थे नफरत से भरे थे अहम् में चूर थे हमारे सुख उनसे देखे ना गए वो पत्थर मारते गए चोट खा कर भी हम मुस्काराते रहे  ...

Wednesday, July 31, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: पहले धरती को जी भर के देख लूं

"निरंतर" की कलम से.....: पहले धरती को जी भर के देख लूं: ना अम्बर की ऊंचाई नापना चाहता हूँ ना समुद्र की गहराई जानना चाहता हूँ पहले धरती को जी भर के देख लूं वृक्षों से जी भर के बात...

Tuesday, July 30, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: मन व्यथा मुक्त हो तो

"निरंतर" की कलम से.....: मन व्यथा मुक्त हो तो: वह दिन अच्छा नहीं लगता जिसमें सूरज तो चमकता है मगर रात का आभास होता है वह रात भी अच्छी लगती है जिसके घनघोर अँधेरे में भी उजाले का आ...

"निरंतर" की कलम से.....: परम्पराओं का संसार

"निरंतर" की कलम से.....: परम्पराओं का संसार: काल बदला समय बदला नहीं बदला तो परम्पराओं का संसार नहीं बदला सदियों से जंजीरों में जकड़ा मान्यताओं का ताला नहीं खुला जीना कितना भी द...

"निरंतर" की कलम से.....: जीवन सत्य

"निरंतर" की कलम से.....: जीवन सत्य: मन की भावनाएं हो ह्रदय का प्रेम हो पेट में रोटी नहीं तो सिवाय भूख मिटाने के कुछ याद नहीं आता जीवन भावनाओं और प्रेम से अधिक आवश...

Saturday, July 27, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: बरगद का पेड़

"निरंतर" की कलम से.....: बरगद का पेड़: मेरे घर के बाहर लगा बरगद का पेड़ आकाश से गिरने वाली वर्षा की नन्ही बूंदों को पत्तों की गोद में लेकर उन्हें धीरे से धरती पर लुड्का ...

Thursday, July 25, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: बिना किसी का सच जाने

"निरंतर" की कलम से.....: बिना किसी का सच जाने: किसी ने किसी को बुरा इंसान बताया बिना किसी का सच जाने कहने वाले का मंतव्य जाने तुमने उसे गीता का पाठ समझ मन में बिठा लिय...

Wednesday, July 24, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: निश्चय अटल है

"निरंतर" की कलम से.....: निश्चय अटल है: जगत में अन्धकार घना है मगर मन उजाले से भरा है ऊर्जा से उफन रहा है पथ कठिन है मगर निश्चय अटल है धमनियों में उबलता रक्त है अ...

Tuesday, July 23, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: निरंतर चलता रहा हूँ

"निरंतर" की कलम से.....: निरंतर चलता रहा हूँ: निरंतर चलता रहा हूँ जीवन से सीख कर जीवन में उतारता रहा हूँ कई मोड़ों पर ठिठका हूँ कई मोड़ों पर झिझका हूँ फिर भी रुका नहीं प...

"निरंतर" की कलम से.....: कोई रात अंधेरी नहीं होती

"निरंतर" की कलम से.....: कोई रात अंधेरी नहीं होती: कोई रात अंधेरी नहीं होती कोई दिन उजला नहीं होता केवल रोशनी की कमी या अधिकता होती मन संतुष्ट ह्रदय प्रसन्न हो तो काली रात उजली ...

"निरंतर" की कलम से.....: किसी और से क्यों आशा करूँ

"निरंतर" की कलम से.....: किसी और से क्यों आशा करूँ: जब भाग्य ने दिया इतना जिसकी कभी आशा भी ना थी फिर भी आज खुश क्यों नहीं हूँ जो निर्णय मैंने स्वयं किये थे उन निर्णयों के ...

"निरंतर" की कलम से.....: सब कुछ समझ कर भी नासमझ बनता रहा

"निरंतर" की कलम से.....: सब कुछ समझ कर भी नासमझ बनता रहा: सब कुछ समझ कर भी नासमझ बनता रहा सच को झूठ झूठ को सच कहता रहा रिश्तों को निभाने के खातिर दुश्मनों को दोस्त कहता रहा काले चेह...

"निरंतर" की कलम से.....: कभी कभी जीवन में

"निरंतर" की कलम से.....: कभी कभी जीवन में: कभी कभी जीवन में ऐसे क्षण भी आते हैं  जब अपने भी पराये लगते हैं रिश्ते नाते अविश्वास के घेरे में घिर जाते हैं आशाओं के आकाश निर...

"निरंतर" की कलम से.....: जिसे कमज़ोर समझा

"निरंतर" की कलम से.....: जिसे कमज़ोर समझा: दिए को सदा कम आंका था जब अन्धेरा हुआ बिजली ने धोखा दिया दिया ही काम आया जिससे आशा थी वो नाकाम रहा जिसे कमज़ोर समझा था ...

"निरंतर" की कलम से.....: ह्रदय हँसता भी है,ह्रदय रोता भी है

"निरंतर" की कलम से.....: ह्रदय हँसता भी है,ह्रदय रोता भी है: मुझे बगीचे में जाना अच्छा भी लगता है अच्छा नहीं भी लगता है ह्रदय हँसता भी है ह्रदय रोता भी है कुछ फूल खिले हुए कुछ मुरझाये ...

"निरंतर" की कलम से.....: कशमकश में

"निरंतर" की कलम से.....: कशमकश में: ज़िन्दगी भर मंजिल की तलाश में निरंतर बिना रुके चलता रहा पर इच्छाएं मुझसे भी आगे चलती रही मंजिल भी हर दिन बदलती रही ना इ...

"निरंतर" की कलम से.....: तुम्हारी तरफ हाथ बढाता हूँ

"निरंतर" की कलम से.....: तुम्हारी तरफ हाथ बढाता हूँ: तुम्हारी तरफ  हाथ बढाता हूँ तुम्हारा अभिवादन करता हूँ तुम मेरा हाथ पकडती भी हो मुस्कराकर मेरा अभिवादन स्वीकार भी करती हो ...

"निरंतर" की कलम से.....: मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ

"निरंतर" की कलम से.....: मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ: मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ पर कहते कहते रुक जाता हूँ कहते हुए डरता हूँ मन की इच्छाओं को अपने भीतर समेट लेता हूँ कैसे कहूँ ...

"निरंतर" की कलम से.....: कोई जाति पूछता है ,कोई धर्म पूछता है

"निरंतर" की कलम से.....: कोई जाति पूछता है ,कोई धर्म पूछता है: कोई जाति पूछता है कोई धर्म पूछता है कोई उम्र तो कोई धंधा पूछता है पूछता है कोई नहीं पूछता मेरा ह्रदय कैसा है मेरा ज्ञान कितना है ...

"निरंतर" की कलम से.....: जो भी हँस कर मिलता मुझसे

"निरंतर" की कलम से.....: जो भी हँस कर मिलता मुझसे: जो भी हँस कर मिलता मुझसे उस से ही मिल लेता हूँ कुछ पल हँस लेता हूँ सोचता नहीं हूँ कब तक साथ हंसेगा कब तक साथ निभाएगा जिनस...

"निरंतर" की कलम से.....: प्रश्नों में उलझने की जगह

"निरंतर" की कलम से.....: प्रश्नों में उलझने की जगह: वही नभ वही धरती वही समुद्र वही प्रकृति फिर रात काली दिन उजला क्यों होता है क्यों सूर्य दिन को चाँद रात को चमकता है प्रश्न तो इतने ...

"निरंतर" की कलम से.....: चाहता हूँ

"निरंतर" की कलम से.....: चाहता हूँ: चाहता हूँ दो कदम चलूँ मंजिल मिल जाए मैं मुस्कराऊँ भर लोग गले से लग जाएँ मैं हकीकत से दूर रहूँ जो भी चाहूँ वैसा हो जाए ये ...

"निरंतर" की कलम से.....: झूठी प्रशंसा के लिए

"निरंतर" की कलम से.....: झूठी प्रशंसा के लिए: महीनों दोस्त की कविताओं क़ी प्रशंसा करता रहा बदले में वो भी मेरी कविताओं की प्रशंसा करेगा निरंतर आस लगाए रहा मगर दोस्त ने दोस्त...

"निरंतर" की कलम से.....: पहले खुद ऐसा बनने का प्रयत्न करो

"निरंतर" की कलम से.....: पहले खुद ऐसा बनने का प्रयत्न करो: मिलना चाहता था किसी इमानदार,शालीन धैर्यवान,सहनशील, दयालु निश्छल मन के सर्वगुण संपन्न व्यक्ति से बरसों ढूंढता रहा पर कोई ना...

"निरंतर" की कलम से.....: मेरे मन की सड़क में

"निरंतर" की कलम से.....: मेरे मन की सड़क में: मेरे मन की सड़क में गलियाँ ही गलियाँ गलियों के अन्दर भी कई गलियाँ असंतुष्टी की गलियाँ इच्छाओं आकांशाओं की गलियाँ मन इन गल...

"निरंतर" की कलम से.....: कौन है जो नहीं जानता

"निरंतर" की कलम से.....: कौन है जो नहीं जानता: कौन है जो नहीं जानता खुद कितना इमानदार कितना बेईमान है फिर भी दूसरों पर ऊंगली उठाता है भूल जाता है कब तक सच को छुपायेगा ...

"निरंतर" की कलम से.....: कली खिल जाए पौधे में तो फूल खिलना भी आवश्यक

"निरंतर" की कलम से.....: कली खिल जाए पौधे में तो फूल खिलना भी आवश्यक: कली खिल जाए पौधे में तो फूल खिलना भी आवश्यक फूल खिल जाए पौधे में तो महकना भी आवश्यक जन्म लिया इंसान ने तो जीना भी आवश्यक ...

"निरंतर" की कलम से.....: जो डरते रहे वो रोते रहे

"निरंतर" की कलम से.....: जो डरते रहे वो रोते रहे: जो डरते रहे वो रोते रहे जो हँसते रहे वो चलते रहे जो समझ गए लुबे लुबाब ज़िन्दगी का वो उम्र भर खुश रहे जो नहीं समझे वो वक...

"निरंतर" की कलम से.....: खाली हाथ आये थे खाली हाथ चले जायेंगे

"निरंतर" की कलम से.....: खाली हाथ आये थे खाली हाथ चले जायेंगे: जब तक चल सकते हैं चलते रहेंगे हँसते रहेंगे ,गाते रहेंगे नए दोस्त बनाते रहेंगे धोखा खाते रहेंगे दर्द-ऐ-दिल सहते रहेंगे ग़मों...

"निरंतर" की कलम से.....: तुमने कहा मुझे नहीं भाया

"निरंतर" की कलम से.....: तुमने कहा मुझे नहीं भाया: तुमने कहा मुझे नहीं भाया मैं नासमझ तुम समझदार हुए मैंने कहा तुम्हें नहीं भाया मैं समझदार तुम नासमझ हुए अहम् टकराता रहा ...

"निरंतर" की कलम से.....: व्यथा में

"निरंतर" की कलम से.....: व्यथा में: व्यथा में रोते रोते अचानक ख्याल आया रोने से किसी को नहीं मिला तो मुझे कैसे मिलेगा मन की व्यथा कम करनी है तो क्यों ना किसी अ...

"निरंतर" की कलम से.....: क्यों किसी से मन की बात कहूँ?

"निरंतर" की कलम से.....: क्यों किसी से मन की बात कहूँ?: क्यों  किसी से मन की बात कहूँ? क्या पता उसकी भी व्यथा मेरे जैसी ही हो क्यों किसी की दुखती रग को छेड़ूँ मेरी व्यथा तो कम ह...

"निरंतर" की कलम से.....: भूत भविष्य के सोच में

"निरंतर" की कलम से.....: भूत भविष्य के सोच में: बचपन में बचपन को कोसता था स्कूल जाना परीक्षा देना अच्छा नहीं लगता था केवल खाना खेलना भाता था जवानी में काम करना जिम्मेद...

"निरंतर" की कलम से.....: कभी जब लिखने बैठता हूँ

"निरंतर" की कलम से.....: कभी जब लिखने बैठता हूँ: कभी जब लिखने बैठता हूँ शब्द खो जाते हैं कलम रुक जाती है कागज़ रीता रह जाता है मन से पूछता हूँ ऐसा क्यों होता है बुझे चेहर...

"निरंतर" की कलम से.....: जीवन, मृत्यु

"निरंतर" की कलम से.....: जीवन, मृत्यु: रक्त की धमनियों सी मेरे मन की धमनियां भी मेरे काले सफ़ेद विचारों को अविरल मस्तिष्क में गतिमान रखती हैं जिस दिन सांस रुक जायेगी ह...

"निरंतर" की कलम से.....: ज़िन्दगी के सफ़र में गिरते सभी हैं

"निरंतर" की कलम से.....: ज़िन्दगी के सफ़र में गिरते सभी हैं: ज़िन्दगी के सफ़र में गिरते सभी हैं ज़ख्म खाते भी सभी हैं दर्द से करहाते भी सभी हैं मुस्कराककर उठते वहीं हैं जो मंजिल तक पहु...

"निरंतर" की कलम से.....: लोग सुंदरता की बात करते हैं

"निरंतर" की कलम से.....: लोग सुंदरता की बात करते हैं: लोग सुंदरता की बात करते हैं सुन्दर चेहरों मीठी बातों पर आसक्त होते हैं उनकी पसंद पर ना कोई उलझन ना ऐतराज़ मुझे मैं सुन्...

"निरंतर" की कलम से.....: अति सब पर भारी पड़ती है

"निरंतर" की कलम से.....: अति सब पर भारी पड़ती है: नदी किनारे लगे उस पेड़ का क्या कसूर जो उफनती नदी के बहाव में उखड जाता है बदहवास भागती भीड़ के रेले में उस बालक का क्या कसू...

"निरंतर" की कलम से.....: "मैं भी गुणी हूँ”

"निरंतर" की कलम से.....: "मैं भी गुणी हूँ”: क्यों हर बात में हर कार्य में  "मैं भी गुणी हूँ” जताने का प्रयत्न करते हो तुम बहुत बुद्धिमान हो लोगों को बताने का प्र...

"निरंतर" की कलम से.....: क्यों हमसे घबराते हो ?

"निरंतर" की कलम से.....: क्यों हमसे घबराते हो ?: क्यों हमसे घबराते हो ? देख कर छुप जाते हो अगर निष्कपट हो  ह्रदय में पाप नहीं मन में शक नहीं तो सामने आओ आँखों से आँखें मिलाओ हँ...

"निरंतर" की कलम से.....: उम्र में बड़ा होना तुम्हें अधिकार नहीं देता

"निरंतर" की कलम से.....: उम्र में बड़ा होना तुम्हें अधिकार नहीं देता: उम्र में बड़ा होना तुम्हें अधिकार नहीं देता छोटों को कुछ भी कह दो तुम अपना बचपन याद करो उचित बात पर भी जब बड़ों की उचित अन...

"निरंतर" की कलम से.....: मन के बीहड़ में

"निरंतर" की कलम से.....: मन के बीहड़ में: मन के बीहड़ में जब बहम की दीमक पाँव फैलाने लगती हैं विश्वास के वृक्षों की जडें खोखली होने लगती हैं वृक्ष सूखने लगते हैं अव...

"निरंतर" की कलम से.....: हवा जब वृक्षों से आलिंगन करती है

"निरंतर" की कलम से.....: हवा जब वृक्षों से आलिंगन करती है: हवा जब  वृक्षों से आलिंगन  करती है पत्ता पत्ता डाली डाली झूमने लगती है चूम कर पत्तों को हवा जब सरसराती हुई अपने कर्तव्य पथ...

"निरंतर" की कलम से.....: क्या अधूरा नहीं है

"निरंतर" की कलम से.....: क्या अधूरा नहीं है: क्या अधूरा नहीं है इच्छाएं अधूरी रहती हैं आशाएं अधूरी रहती हैं ज्ञान अधूरा रहता है भावनाएं अधूरी रहती हैं कोई रिश्ता पूरा नहीं...

"निरंतर" की कलम से.....: पूर्वाग्रह से ग्रस्त

"निरंतर" की कलम से.....: पूर्वाग्रह से ग्रस्त: मेरा लिखा आपको अच्छा नहीं लगे तो कोई बात नहीं बिना पढ़े, बिना सोचे समझे मन में पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो कर अगर आप ने कहा मैंने जो...

"निरंतर" की कलम से.....: जो मन कहता है

"निरंतर" की कलम से.....: जो मन कहता है: जो मन कहता है अवश्य करो पर करने से पहले क्या मन चेतन है जान लो जीवन की विषमताओं को सूक्ष्म दृष्टि से परख लो...

"निरंतर" की कलम से.....: प्रश्न यह नहीं है

"निरंतर" की कलम से.....: प्रश्न यह नहीं है: प्रश्न यह नहीं है किसी से कुछ मिलेगा या नहीं मिलेगा प्रश्न यह भी नहीं कोई कुछ देगा या ना देगा जिससे भी मन मिलता है जिसे भी ह...

"निरंतर" की कलम से.....: बात करने में क्या बिगड़ता है

"निरंतर" की कलम से.....: बात करने में क्या बिगड़ता है: जब लोगों को कहते सुनता हूँ बात करने में क्या बिगड़ता है बड़े बोल बोलने में क्या जाता है सोचने लगता हूँ कितना अच्छा होता ...

Tuesday, March 19, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: हार कर भी जीत जाऊंगा

"निरंतर" की कलम से.....: हार कर भी जीत जाऊंगा: मैं इतना बलशाली नहीं तुमसे लोहा ले सकूँ पर इतना निर्बल भी नहीं तुम्हारे निरंकुश दुर्व्यवहार का प्रतिरोध ना कर सकूँ मैं हार ...

Monday, March 18, 2013

"निरंतर" की कलम से.....: बार बार समझाता हूँ

"निरंतर" की कलम से.....: बार बार समझाता हूँ: बार बार समझाता हूँ बार बार पूछता हूँ क्यों क्रोध करते हो बात बात में चिढते हो क्या धैर्य धीरज भूल गए सहनशीलता से भी रुष्ट हो गए ...

"निरंतर" की कलम से.....: हाथों की लकीरों को देखता हूँ

"निरंतर" की कलम से.....: हाथों की लकीरों को देखता हूँ: हाथों की लकीरों को देखता हूँ सोचने लगता हूँ भाग्य की प्रतीक्षा करूँ या कर्म से भाग्य बनाऊँ हाथों की ताकत को काम में लूं पर जानत...